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Tuesday, 4 July 2017

निबंध- ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक तापन) आशय, कारण, दुष्प्रभाव, रोकथाम के उपाय

ग्लोबल वार्मिंग अर्थात वैश्विक तापन-

पृथ्वी के तापमान का औसत से अधिक होना ग्लोबल वार्मिंग कहलाता है|
ग्लोबल वार्मिंग एक सामान्य प्रक्रिया है जो पृथ्वी के औसत तापमान 18 डिग्री सै. बनाये रखने के लिए जरुरी है| मगर इसके बढ़ जाने से कई प्रकार के खतरे हैं|
सूर्य से आने वाली किरणों का कुछ भाग परावर्तित हो जाता है और कुछ भाग बादलों और हवा में मौजूद गैसों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है| वहीँ सूर्य की अधिकतर किरणें धरती की सतह तक पहुँचती है और धरती का तापमान बढाती हैं| ये किरणें धरती की सतह से परावर्तित होने के बाद ग्रीन हाउस गैसों जैसे मीथेन, कार्बन-डाइऑक्साइड और क्लोरो फ्लोरो कार्बन द्वारा अवशोषित की जाती हैं और इन्हें वापस वातावरण में भेजा जाता है| यह एक सामान्य प्रक्रिया है जो पृथ्वी का औसत तापमान 18 डिग्री सै. बनाये रखने के लिए जरुरी है|
मगर हाल के कुछ वर्षों में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा वातावरण में बढ़ने से पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि हुई है| तापमान की यह वृद्धि बड़ी तेजी से हो रही है और इसका सीधा असर जलवायु परिवर्तन के रूप में दिख रहा है| पिछले दो दशकों में ही पृथ्वी का औसत तापमान 6 डिग्री सै. तक बढ़ चुका है|

कारण-

ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख कारण वाहनों और उद्योगों द्वारा किया जाने वाला गैसीय उत्सर्जन है|
जंगलों का घटता क्षेत्र और आबादी का बढ़ता दबाव भी ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख कारणों में है|
क्लोरो-फ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन करने वाले यंत्रों और उत्पादों का बढ़ता उपयोग भी ग्लोबल वार्मिंग के लिए उत्तरदायी है|

दुष्प्रभाव-

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं| जिसके कारण नदियों और समुद्रों में जल की मात्र बढ़ रही है| परिणाम स्वरूप तटीय इलाकों के आने वाले वर्षों में समुद्र में समा जाने का खतरा बढ़ रहा है|
ग्लोबल वार्मिंग के चलते ओजोन परत में विशाल छेद हो चुका है|
ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु में बदलाव आ रहा है| प्राकृतिक ऋतु चक्र प्रभावित हो रहा है|

रोकथाम के उपाय-

ग्लोबल वार्मिंग विश्वस्तरीय समस्या है| इसका कोई अकेला व्यक्ति या देश समाधान नहीं कर सकता | किन्तु इसकी रोकथाम में हम सब की भूमिका महत्त्वपूर्ण है| कुछ उपाय जिन्हें करके हम ग्लोबल वार्मिंग की रोकथाम में सहयोग कर सकते हैं-
1. अधिक से अधिक पौधारोपण किया जाए|
2. क्लोरो-फ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन करने वाले यंत्रों और उत्पादों के प्रयोग को हतोत्साहित किया जाए|
3. कृषि अवशेषों को जलाने पर रोक लगाईं जाए|
4. सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत बनाकर निजी वाहनों के प्रयोग को कम किया जाए|
5. घरेलू इंधन के रूप में लकड़ी, कोयला और गोबर के कंडे के स्थान पर एलपीजी गैस के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए|
6. उद्योगों में आधुनिक तकनीक वाली ऊँची चिमनियों का प्रयोग किया जाए|


Sunday, 17 April 2016

ओजोन परत को जानें

क्या होती है ओजोन गैस-

ओजोन गैस ओक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनाने वाली गैस है| जो वातावरण में मात्र 0.02 प्रतिशत के लगभग पाई जाती है| यह एक ऐसी गैस है जो पृथ्वी के निकट के वायुमंडल में तो इंसानों के लिए हानिकारक है और समताप मंडल में लाभकारी| पृथ्वी पर ओजोन मानव श्वसन तंत्र को बुरी तरह प्रभावित करती है|

कहाँ होती है ओजोन परत

पृथ्वी के धरातल से 15 से 40 किलोमीटर की उंचाई पर वायुमंडल के समताप मंडल (स्ट्रेटो स्फियर) क्षेत्र में ओजोन अणुओं की एक पतली चादर है, जिसे ओजोन परत कहते हैं। इस चादर ने हमारी पूरी पृथ्वी को आवरण प्रदान किया हुआ है। इस मंडल में मौजूद ओजोन पृथ्वी को सूर्य की पैराबैंगनी किरणों से बचाता है| जब सूर्य की किरणें ओजोन परत में से होकर गुजरती हैं, तो ओजोन अणु तमाम नुकसान पहुंचाने वाले पैराबैंगनी विकिरण को रोक लेते हैं, अगर पैराबैंगनी किरणों का विकिरण इस ओजोन आवरण/परत को पार कर सीधे पृथ्वी तक पहुँच जाए तो यहाँ जीना दूभर हो जाए|

कैसे बनती है ओजोन परत-

ओजोन प्राकृतिक रूप से ही बनती है| जब सूर्य की किरणें वायुमंडल की ऊपरी सतह पर मौजूद ओक्सीजन से टकराती हैं तू उच्च ऊर्जा विकिरण से इसका कुछ हिस्सा ओजोन में बदल जाता है| कुछ अन्य क्रियाओं से भी ओक्सीजन ओजोन में बदल जाती है| 

ओजोन परत को खतरा क्यों-

औद्योगिक विकास के चलते हानिकारक रसायनों जैसे सी.एफ.सी. (क्लोरो-फ्लोरो कार्बन) और क्लोरीन गैस का वायुमंडल में घुलना जारी है| जिनके कारण ओजोन परत को खतरा पैदा हो गया है| क्योंकि ये रसायन और गैस ओजोन मंडल में पहुँचकर ओजोन को ओक्सीजन में विघटित कर रहे हैं| जिससे ओजोन परत का दक्षिणी ध्रुव से क्षरण हो रहा है और उसमें छेद हो गए हैं|  सबसे पहले एफ.एम. रोलैंड ने जो यू.एस.ए. के रहने वाले हैं, ओजोन में छिद्र होने की जानकारी दी | निम्बस—7। उपग्रह ने ओजोन छिद्र की उपस्थिति दर्ज की थी| बंसत ऋतु में ओजोन छिद्र सबसे बड़ा दिखाई देता है|  10 दिसम्बर 2005 को ओजोन छिद्र का आकार 38.61 लाख वर्ग मील हो चुका था।

कहाँ-कहाँ से निकलते हैं सी.ऍफ़.सी-

सी.ऍफ़.सी. का सर्वाधिक उत्सर्जन रेफ्रीजरेटर, एयर कंडीशनर्स, फोम उद्योगों, सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री इकाइयों से होता है|

कौन है ओजोन परत के क्षरण का उत्तरदायी-

इस परत के ह्रास के लिए विकसित देश अधिक उत्तरदायी हैं, किन्तु वे अपने उत्सर्जन में कटोती करने की अपेक्षा विकासशील देशों पर इसका आरोप मढ रहे हैं| ओजोन संकट पर विचार के लिए पहली बैठक सन् 1985 में वियना में आयोजित की गई थी| तभी से प्रयास किये जा रहे हैं| जनसाधारण को भी इस दिशा में जागरूक करने के लिए 16 सितम्बर को ओजोन संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता| समस्या की गंभीरता को देखते हुए बार-बार सम्मेलन और समझौते हो रहे हैं, किन्तु कोई ठोस कार्य नहीं हुआ है| जो चिंता का विषय है| 





वनस्पतियों का महत्त्व

वनस्पतियाँ भू-मंडल पर मानव जाति के अस्तित्व का आधार हैं| यदि पेड़-पौधे न हों तो मनुष्य क्या अन्य जंतु भी इस पृथ्वी पर न रहें| श्वास लेने के लिए भी हम प्रकृति प्रदत्त पेड़-पौधों पर ही निर्भर करते हैं| वनस्पतियाँ हमें भोजन] वस्त्र] औषधि सभी कुछ प्रदान करती हैं| अपने आवास के लिए भी हम बहुत कुछ वृक्षों पर निर्भर करते हैं|
भारत में आदि काल से ही मनुष्य प्रकृति की इस दें पर निर्भर रहा है| ऋगवेद एवं अथर्ववेद में वनस्पति विज्ञानं के महत्त्व का वर्णन किया गया है|  अथर्ववेद में औषधियों के गुणों को प्रदर्शित करने वाले कुछ सूक्त मिलते हैं| अत्रेय ऋषि के शिष्य अग्निवेश ने सर्वप्रथम आयुर्वेद पर ग्रन्थ लिखा| अत्रि ऋषि के ही पांच अन्य शिष्यों के साथ मिलकर अग्निवेश ने "षड्भिषज"संहिता" ग्रन्थ लिखा| बाद में चरक, वाग्भट 'भावप्रकाश' 'निघुट' आदि ग्रंथों की हुई|
आयुर्वेद की "रस वेधक" और जर्मन शोधक हान्मन द्वारा प्रतिपादित होमियोपैथी में भी वनस्पतियों की उपयोगित क भरपूर लाभ उठाया गया है|
यह भी सर्वमान्य तथ्य है कि किसी भी देश के आर्थिक विकास में उस देश की प्राकृतिक संपदा का बहुत अधिक योगदान होता है|
इतना ही नहीं हमारे पर्यावरण को सुखद बनाने के लिए] मानव जारी के लिए भोजन, वस्त्र, औषधि, इंधन देने के लिए, भवन निर्माण के लिए, प्रौधोगिक विकास के लिए और जीवित रहने के लिए 'श्वासोच्छ्वास प्रक्रिया के लिए अद्वितीय योगदान वनस्पतियाँ करती हैं|   

Saturday, 19 March 2016

बिजली की बचत पर्यावरण की रक्षा

"बिजली की बचत ही बिजली की बढ़त है|" आपने अक्सर सुना होगा| इसका अभिप्राय है यदि हम कम बिजली  की खपत करते हैं तो जो बिजली बचती है, वह हमारे बाद में काम आ जाती है| यानी कि बिजली बचाकर हम न सिर्फ उसकी मात्रा बढ़ाते हैं, बल्कि कम बिल अदा करके अपना पैसा भी बचाते हैं| 
बिजली की बचत से हमें आर्थिक लाभ तो होता ही है] इससे हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित होता है| क्योंकि की बिजली पैदा करने के लिए थर्मल प्लांटों में कोयला जलाया जाता है, जिससे जहरीली गसें हमारे वातावरण को प्रदूषित करती हैं| इतना ही नहीं थर्मल प्लांटों से निकलने वाली फ्लाई ऐश भी पर्यावरण को प्रदूषित करती है साथ ही उसका भण्डारण भी अब गंभीर समस्या बनता जा रहा है| एक अनुमान के अनुसार लगभग 50 हजार एकड़ उपजाऊ भूमि फ्लाई ऐश के नीचे दबी हुई है| 
यदि हम बिजली की खपत बढ़ाते जायेंगे तो हमें अधिक कोयला जलाना होगा, परिणामस्वरूप अधिक गसें वायुमंडल में घुलेंगी और अधिक फ्लाई ऐश के ढेर लगेंगे| लेकिन यदि हम कम मात्रा में बिजली की खपत करके बिजली बचायेंगे तो कम गैस उत्सर्जन होगा और हमारा पर्यावरण शुद्ध रहेगा| 

बिजली की बचत के उपाय- 

बिजली की बचत के लिए हमें बहुत अधिक त्याग की जरुरत नहीं है, यदि हम अपनी आदतों में मामूली सा सुधार कर लें और छोटी छोटी बातों का ध्यान रखें तो भी बिजली की काफी बचत कर सकते हैं| जैसे-
1. परम्परागत बल्बों की बजाय एल ई डी बल्ब या सी एफ एल टयुबों का प्रयोग करें| इससे भारी मात्रा में बिजली की बचत होगी|
2. आवश्यकता न होने पर लाइट, पंखे, कूलर, AC, टी वी आदि को बंद कर दें|
3. किसी भी उपकरण को अधिक देर तक स्टैंडबाई मोड में न रखें|
4. अच्छी कंपनी के और फाइव स्टार रेटिंग वाले उपकरण ही खरीदें, जो कम बिजली की खपत करते हैं|
5. नलकूपों की मोटर केवल तभी चलायें जब खेती को वास्तव में ही पानी देने की जरुरत हो| फ्लैट रेट पर मिलने वाली बिजली का दुरुपयोग न करें|
6. बिजली के उपकरणों को काम समाप्त होते ही बंद कर दें|

उपरोक्त बातों का ध्यान रखकर हम भी बिजली की बचत और पर्यावरण की सुरक्षा कर सकते हैं| तो आज से ही इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनायें और पर्यावरणविद बनें|