Wednesday, 4 November 2015

शोर प्रदूषण - कारण और निवारण

ध्वनि / शोर प्रदूषण (Noise Pollution) 

शोर अथवा ध्वनि प्रदूषण से आशय है- अनावश्यक, अनुपयोगी, असुविधाजनक कर्कश ध्वनि| शोर प्रदूषण दो प्रकार का होता है| क.प्राकृतिक और ख. कृत्रिम| बादलों का गरजना, नदियों व झरनों का शोर, तूफ़ान व भूकंप से होने वाला शोर आदि प्राकृतिक शोर प्रदूषण के स्त्रोत हैं| जबकि मानव कृत शोर कृत्रिम शोर प्रदूषण की श्रेणी में आता है| 
शोर प्रदूषण की मात्रा को उसके दबाव, सघनता, उच्चता अथवा तारत्व से मापा जाता है| शोर मापने की इकाई को डेसीबल अथवा डी.बी. कहते हैं| 
शोर प्रदूषण के प्रमुख कारणों में वाहन, कारखाने, धार्मिक आयोजन, राजनैतिक कार्यक्रम, विवाह समारोह और वायुयानों का शोर आदि प्रमुख हैं|
शोर प्रदूषण का सर्वाधिक दुष्प्रभाव कान पर होता है, क्योंकि शोर प्रदूषण से श्रवण शक्ति का ह्रास होता है| इसके अलावा चिडचिडापन, बहरापन, चमड़ी पर सरसराहट, उलटी, जी-मितलाना, चक्कर आना और स्पर्श अनुभव की कमी जैसे दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं| शोर का स्तर 190 डी.बी. से अधिक होने पर व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है| विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग शोर स्तर को सुरक्षित माना है| औद्योगिक क्षेत्रों में 75 डेसीबल, व्यापारिक क्षेत्रों में 65 डेसीबल,आवासीय क्षेत्रों में 55 डेसीबल तथा शांत क्षेत्रों में 50 डेसीबल शोर सुरक्षित माना जाता है| यहाँ शांत क्षेत्र से आशय उन इलाकों से है जहाँ अस्पताल, पुस्तकालय और शिक्षण संस्थान आदि हों|
शोर प्रदूषण को रोकने के लिए आवश्यक है कि निजी वाहनों का प्रयोग कम से कम किया जाए और सार्वजानिक परिवहन को बढ़ावा दिया जाए| डी.जे., टी.वी., रेडियो, म्यूजिक प्लेयर आदि धीमी आवाज पर बजाएं, हॉर्न का प्रयोग अति आवश्यक होने पर ही करें और प्रेशर हॉर्न का प्रयोग बिलकुल न करें| आतिशबाजी न करें, लाउडस्पीकर का प्रयोग आवश्यक होने पर निश्चित आवाज़ में ही करें| धार्मिक आडम्बरों का शोर रोका जाए और ध्वनी प्रतिरोधी भवनों का निर्माण करके भी शोर प्रदूषण पर नियंत्रण किया जा सकता है| 
शोर प्रदूषण की रोकथाम के लिए अनेक कानून बने हुए हैं| सर्वोच्च न्यायालय ने भी शोर प्रदूषण की रोकथाम के लिए रात दस बजे से सुबह छ बजे तक लाउडस्पीकर का प्रयोग वर्जित किया हुआ है| किन्तु न तो हमारी क़ानून लागू करने वाली एजेंसीज इस मामले में गंभीर हैं और न लोग ही अपना उत्तरदायित्व समझते हैं| 
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सब मिलकर इस समस्या के समाधान के लिए अपना योगदान दें| तभी इस बिमारी पर काबू पाया जा सकेगा|

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